मंगलवार, 4 अगस्त 2015
शनिवार, 25 जुलाई 2015
मेरा मुझ मैं कुछ नहीं (भाग -१)
मेरा मुझ मैं कुछ नहीं भाग -१
जो भी लिखा है इसमें मेरा कुछ नहीं , बस कुछ मुक्ता-कण संतों- महात्माओं के प्रवचन से मिले हैं , शेयर कर रही हूँ।
चैतन्य कौन है ?चैतन्य वह है जो प्रमाद -रहित है।-
सबसे बड़ी शक्ति उस व्यक्ति के हाथ में है , जिसमे है एकाग्रता।
एकाग्रता वह विभूति है जिसके बिना आप महान नहीं बन सकते।
यदि आप बड़े नहीं बन सके तो आप के पास है प्रमाद। अपने वैरी गिनने लगें तो एक ही है वह -प्रमाद। प्रमाद,आलस्य आता है अज्ञानता से और पतन का मूल कारण भी यही है।
क्रमशः
जो भी लिखा है इसमें मेरा कुछ नहीं , बस कुछ मुक्ता-कण संतों- महात्माओं के प्रवचन से मिले हैं , शेयर कर रही हूँ।
चैतन्य कौन है ?चैतन्य वह है जो प्रमाद -रहित है।-
सबसे बड़ी शक्ति उस व्यक्ति के हाथ में है , जिसमे है एकाग्रता।
एकाग्रता वह विभूति है जिसके बिना आप महान नहीं बन सकते।
यदि आप बड़े नहीं बन सके तो आप के पास है प्रमाद। अपने वैरी गिनने लगें तो एक ही है वह -प्रमाद। प्रमाद,आलस्य आता है अज्ञानता से और पतन का मूल कारण भी यही है।
क्रमशः
क्षमा कीजिये
शब्द
शब्द की सत्ता विराट है , मारक भी है और तारक भी ।
जो शब्द की साधना कर लेते हैं , ब्रह्म को पा लेते हैं, विश्व में शासन करते हैं।
शब्द में अमृत छुपा है। .
शब्द बोधक भी है और औषधि भी।
शब्द का प्राणघातक प्रभाव भी होता है ।
अतः शब्द का प्रयोग सोच समझ कर करें।
क्षमा कीजिये यह सब मैं स्वयं के लिए लिख रही हूँ।
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शब्द की सत्ता विराट है , मारक भी है और तारक भी ।
जो शब्द की साधना कर लेते हैं , ब्रह्म को पा लेते हैं, विश्व में शासन करते हैं।
शब्द में अमृत छुपा है। .
शब्द बोधक भी है और औषधि भी।
शब्द का प्राणघातक प्रभाव भी होता है ।
अतः शब्द का प्रयोग सोच समझ कर करें।
क्षमा कीजिये यह सब मैं स्वयं के लिए लिख रही हूँ।
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साधक कौन
साधक कौन है?
साधक वह है , जिसका एकांत पवित्र है , जिसके स्वप्न पवित्र हो गए हैं। जिसके एकांत में सयंम रहे , नैतिकता रहे ,अस्वाद ,अक्रोध , अनिंदा व् समता रहे , वही साधक है.
साधक वह है , जिसका एकांत पवित्र है , जिसके स्वप्न पवित्र हो गए हैं। जिसके एकांत में सयंम रहे , नैतिकता रहे ,अस्वाद ,अक्रोध , अनिंदा व् समता रहे , वही साधक है.
शनिवार, 29 नवंबर 2014
घर घर की कहानी
लड़की तो ठीक ही है, खाना बनाना भी आता है या नहीं?
शादी के बाद नौकरी तो करनी ही पड़ेगी।
हम दहेज़ विरोधी हैं ,हमे कुछ नहीं चाहिए , बस हमारे बरातियों का स्वागत अच्छे से होना चाहिए।
कितने हो जायेंगे ?
यही कोई पंद्रह सौ .
बरात थोड़ा कम करले
यह तो अंदाजा है, लिस्ट बनाने पर ज्यादा भी हो सकते है
बाराती थोरे कम करके रिसेप्शन पर उन्हें बुला लीजिये।
तो रिसेप्शन का आधा खर्चा आप दे दीजिये , हाँ , खाना नॉन वेज होना चाहिए।
ड्रिंक का इंतजाम हमने कर लिया है ,आप को तकलीफ नहीं देंगे.
तब तो क्षमा कीजिये महाशय।
शादी के बाद नौकरी तो करनी ही पड़ेगी।
हम दहेज़ विरोधी हैं ,हमे कुछ नहीं चाहिए , बस हमारे बरातियों का स्वागत अच्छे से होना चाहिए।
कितने हो जायेंगे ?
यही कोई पंद्रह सौ .
बरात थोड़ा कम करले
यह तो अंदाजा है, लिस्ट बनाने पर ज्यादा भी हो सकते है
बाराती थोरे कम करके रिसेप्शन पर उन्हें बुला लीजिये।
तो रिसेप्शन का आधा खर्चा आप दे दीजिये , हाँ , खाना नॉन वेज होना चाहिए।
ड्रिंक का इंतजाम हमने कर लिया है ,आप को तकलीफ नहीं देंगे.
तब तो क्षमा कीजिये महाशय।
मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014
प्रधानमंत्री मोदीजी के नाम पत्र
आदरणीय प्रधानमंत्री जी,
आपसे विनम्र निवेदन है कि स्वच्छ भारत अभियान के अंतरगत सभी भारतवासियों को मिटटी के दीयों में शुद्ध देसी घी से दीपावली मनाने का आहवान करें। प्रति वर्ष भारतीय करोड़ो रुपये की आतिशबाज़ी, पटाखे आदि जला कर राख़ करते हैं जिसके फलस्वरूप ध्वनि और वायु प्रदूषण के कारण प्रति वर्ष बढ़ी संख्या में लोग जलने की, बहरे हो जाने, शवसन संबधी रोगों के कारण अस्पतालों में भर्ती होते हैं ।
जिस प्रकार विकसित देशों में आवासीय क्षेत्रो में पटाखे जलाने पर रोक है और गैर-आवासीय निर्धारित क्षेत्रो में अग्रिम अनुमति के पश्चात ही एक सीमित मात्रा में पटाखे जला सकते हैं, इसी प्रकार भारत में भी कानून -व्यवस्था बनायी जाय ताकि लोगो को स्वच्छ वातावरण में सांस लेने का सौभाग्य प्राप्त हो।
लोगो को अवगत कराना है कि स्वच्छता सड़को तक सीमित न हो, हमारे मन वचन कर्म में भी दृष्टिगत होनी चाहिए। हमारी बातचीत में गाली-गलौज का कोई स्थान नहीं होना चाहिये। निरर्थक बातों में समय व्यर्थ न करके गीता के अनुसार कर्म को महत्व दिया जाना चाहिए। हमें निरंतर सृजनात्मक कार्यो में रूचि बढ़ानी चाहिए। द्वेष व् ईर्ष्या का हमारे मन में कोई स्थान न हो और वसुधैव कुटंबकम् परस्पर प्रेम व् सहयोग से जीवनयापन करें।
आपसे विनम्र निवेदन है कि स्वच्छ भारत अभियान के अंतरगत सभी भारतवासियों को मिटटी के दीयों में शुद्ध देसी घी से दीपावली मनाने का आहवान करें। प्रति वर्ष भारतीय करोड़ो रुपये की आतिशबाज़ी, पटाखे आदि जला कर राख़ करते हैं जिसके फलस्वरूप ध्वनि और वायु प्रदूषण के कारण प्रति वर्ष बढ़ी संख्या में लोग जलने की, बहरे हो जाने, शवसन संबधी रोगों के कारण अस्पतालों में भर्ती होते हैं ।
जिस प्रकार विकसित देशों में आवासीय क्षेत्रो में पटाखे जलाने पर रोक है और गैर-आवासीय निर्धारित क्षेत्रो में अग्रिम अनुमति के पश्चात ही एक सीमित मात्रा में पटाखे जला सकते हैं, इसी प्रकार भारत में भी कानून -व्यवस्था बनायी जाय ताकि लोगो को स्वच्छ वातावरण में सांस लेने का सौभाग्य प्राप्त हो।
लोगो को अवगत कराना है कि स्वच्छता सड़को तक सीमित न हो, हमारे मन वचन कर्म में भी दृष्टिगत होनी चाहिए। हमारी बातचीत में गाली-गलौज का कोई स्थान नहीं होना चाहिये। निरर्थक बातों में समय व्यर्थ न करके गीता के अनुसार कर्म को महत्व दिया जाना चाहिए। हमें निरंतर सृजनात्मक कार्यो में रूचि बढ़ानी चाहिए। द्वेष व् ईर्ष्या का हमारे मन में कोई स्थान न हो और वसुधैव कुटंबकम् परस्पर प्रेम व् सहयोग से जीवनयापन करें।
सोमवार, 6 अक्टूबर 2014
आज का मनुज
आज से सदियों पहले ब्राह्मण जाति का वर्चस्व था किन्तु आज तो केवल वैश्य जाति पूरे संसार में दिखाई देती है। कोई मित्र सम्बन्धी नहीं ,बस व्यापार ही हो रहा है। माता- पिता,भाई -बहिन, पति- पत्नी, पुत्र- पुत्री व् अन्य सभी रिश्ते एक स्वार्थ के सूत्र में पिरोये हुए हैं. मन की दृष्टि व्यापारियों की भांति हो गयी है । प्रेम की सुगन्धि लुप्त हो गयी है। चारों ओर ईर्ष्या और द्वेष के कैकटस दिखाई पढ़ते हैं. जरा सी कमी-बेशी हो जाने पर एक दूसरे से लड़ाई -झगड़ा ,मुकदमेबाजी,हत्याएं आये दिन ख़बरों में सुनने को मिलती हैं. हर आदमी होड़ में एक दूसरे को पीछे छोड़ कर आगे निकल जाना चाहता है. कहाँ तक दौड़ेगा यह उसे खुद को भी पता नहीं है. बस एक दिशाहीन रेडार की तरह। आज के मनुज ने कुछ भी निश्चित नहीं किया क़ि उसे कितना धन -सम्पति ,कैसी कार , क्या नौकरी-पेशा ,कैसा घर, कैसी बहू इत्यादि चाहिए ,बस उसके पडोसी या परिचितों से अधिक बेहतर होनी चाहिए। एक अंतहीन प्रतियोगिता /प्रतिद्वन्दिता की भावना लिए भागे चला जा रहा है बिना किसी की हानि की चिंता किये आज का मनुज।
सोमवार, 14 जुलाई 2014
नर हो न निराश करो मन को
आओ हम, क्षितिज के उस पार से भी झाँकने न दें , निराशा को
जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियां तो निश्चित ही आएँगी
हम जहाँ भी हैं , अपना स्थान क्यों छोड़ें ?
केवल अपने स्थान पर ही हीरा कहलाता है दांत
और उसके बाद…………
प्रतिकूलता की स्थिति में हम क्योंकर करें पलायन
उचित होगा यदि
इनके मध्य ही रहकर उदासीन हो जाएँ
और प्रतिकूलता सह न पाएगी उपेक्षा
आत्मग्लानि में स्वयं ही अस्तित्वहीन हो जाएगी।
मंगलवार, 1 जुलाई 2014
लोधी गार्डन , बेबी नोनी और मैं
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