सोमवार, 14 जुलाई 2014

नर हो न निराश करो मन को



आओ हम, क्षितिज के उस पार से भी झाँकने न दें ,  निराशा को
 जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियां  तो  निश्चित ही आएँगी 
 हम  जहाँ भी हैं  ,  अपना  स्थान  क्यों  छोड़ें ?
 केवल अपने स्थान पर ही हीरा कहलाता है दांत
और उसके बाद…………
प्रतिकूलता की स्थिति में हम क्योंकर  करें पलायन 
 उचित होगा यदि 
इनके  मध्य ही रहकर उदासीन हो जाएँ 

और प्रतिकूलता सह न पाएगी उपेक्षा 
आत्मग्लानि में स्वयं ही अस्तित्वहीन हो जाएगी।


मंगलवार, 1 जुलाई 2014

लोधी गार्डन , बेबी नोनी और मैं

जून  हालाँकि गर्मी का महीना है , पर प्रभु ने हमारे लिए मौसम कुछ सुहाना बना दिया ताकि हम यानि कि बेबी  नोनी  और मैं लोधी गार्डन   के प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद उठा सके.आइए यह वीडियो देखिये और बताइए  कैसी लगी। 

मंगलवार, 24 जून 2014

LODHI GARDEN IN NEW DELHI, INDIA

Amusement with nature in Lodhi Garden with NONI

रविवार, 20 अप्रैल 2014

गरीबी और बेरोजगारी ( भाग-१ )


          आज हमारी  पीढ़ी  के सामने कई स्वजनित समस्याऍ हैँ, क्योंकि अपनी दृष्टि  में हम अपने को वास्तविक स्थिति  से  ज्यादा हाई स्टेटस  का समझते हैं। अभिभावकों को भी श्रेय जाता है जो जी-जान से हमारी  इच्छाओं की पूर्ति किये जाते हैं भले ही उनकी सामर्थ्य हो या नहीं। निर्धन तो कोई नहीं है  लेकिन अल्प -धनी  (मिडिल क्लास ) आज समाज में  हेय  दृष्टि से देखा जाता है मवाद  की भांति, तभी तो इसे  हर कोई ढ़ांपना चाह्ता है  क्रेडिट कार्ड से जो ऋण या कर्ज नहीं कहलाता आजकल। फलस्वरुप इस सुविधा ने अशान्ति बढ़ा दी है। 

            प्रतिस्पर्धा की भावना से कोई भी अछूता नहीं है , फिर चाहे वह शिक्षा के क्षेत्र में हो या अर्थोपार्जन के।  प्रति वर्ष परीक्षा के परिणाम आने  के बाद कई  विद्यार्थी आत्महत्या करते हैं। 
अहम्  इतना  हावी  हो गया  है स्वयं को  कोई  अपने योग्य रोज़गार नहीं दिखाई देता।  ऐसा नहीं कि काम की कमी है हमारे देश में , लेकिन समस्या है कि हमें पसंद की नौकरी नहीं मिलती, या फिर हमारी छटपटाहट कम  होती हैं उस के लिए। यदि मिल जाए तो वह हमारी इच्छाओं के अनुकूल  होने की अपेक्षा करते हैं हम।
ईर्ष्या ,द्वेष की अग्नि हमारे अंतर्मन को अशांत करने लगती है। आज परायों का तो क्या सहोदर का सुख भी हमें जलाता है। यदि हमारा सहकर्मी अपनी मृदु-भाषिता द्वारा प्रभाावित करता है मालिक को तो हम उसे चाटुकार समझने लगते हैं। जब चाहे लाभ -हानि  सोचे बिना खेल ख़राब कर सकते  हैँ।
लोभ भी कुछ कम नहीं है ,जैसे ही किसी सहकर्मी/अपने  की पगार बढ़ी हमारे पेट में दर्द होने लगता है ,या किसी पड़ोसी/मित्र /संबधी की आय अधिक होने लगे तो हीन-भावना से ग्रसित  हो जाते हैं। जैसे-तैसे स्वयं को नियंत्रण में रख भी ले तो कोई न कोई चिंगारी लगा कर ऐसा आभास कराने  लगते  है कि अमुक पदार्थों  का अभाव है हमारे पास। 

  प्रदर्शन की भावना को लेकर समाज में अपने वर्चस्व   बनाये  रखने के लिए हमें मालूम भी नहीं पढता कि    कब बेकार अतिरिक्त  वस्तुओं पर अनावश्यक व्यय क़र बैठे हैं हम और हमारा बजट बिगड़ गया।

हमें वित्त-प्रबंधन , आवश्यकता -प्रबंधन, इच्छा-प्रबंधन  की आवश्यकता है ,
                 मैने  पढ़ा था कि समय़ की व्यस्तता  नहीं बल्कि अनियमतिता मनुष्य  को मारती  है.  इसी प्रकार यदि अपव्ययों से अपने को बचायें  तो  हमारे पास  धन की कमी नहीं होगी, यदि  हो तो हमें समझ लेना चाहिए कि हमाऱी वित्त-प्रबंधन  में कहीँ त्रुटि  हो गयी  है। हमारी आवश्यकताओं और इच्छाओं के बीच की दूरी  बहुत बढ़  गयी है।  सर्वप्रथम प्राथमिकता  के आधार पर, सतर्क हो कर हमें  केवल आवश्यकतायो की सूची बनानी  चाहिए। सतर्कता इस लिए कि कहीं कोई इच्छा चुपके से न आजाय।                                                                             (क्रमशः )

मंगलवार, 4 मार्च 2014

How to open a Kiosk

How to open a Kiosk

In our life number of times, we became buyers but we don't have experience of seller. Have you ever noticed that despite no need of the certain thing, we had to buy the same. This is repercussion of the seller's tacts.

रविवार, 4 अगस्त 2013

आरोग्य का रहस्य

हमें निरोग रहने के लिए अपने आहार का ध्यान रखना चाहिए आहार से अभिप्राय केवल भोजन से नहीं बल्कि इसके अतिरिक्त सभी इन्द्रियों के आहार से हैहम आँखों से क्या देखते हैं कानो से क्या सुनते हैं मन में क्या सोचते हैं । प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति मे,  जिस प्रकार तन मे कूढ़ा इकठा होने पर रोगी हो जाते हैं , उसी प्रकार मन मे स्वच्छ्ता  न रहने  पर अर्थात मन मे किसी के प्रति ईर्ष्या द्वेष क्रोध ,किसी की निंदा करने पर भी हम रोगी हो जाते हैं। किसी वस्तु या व्यक्ति  विशेष मे  दीर्घ काल तक दोष देखते रहने पर हमें हड्डियों मे दर्द होना शुरू हो जाता है , जो बाद मे गठिया  रोग बन जाता है. जब हम छोटी छोटी बातों  पर गुस्सा होते हैं तो एक समय के बाद उच्च  रक्त चाप हो जाता है, जो आगे जाकर पैरालिसिस  तक भी हो सकता है।  जोर से चिला कर गुस्सा करने से साँस संबधी बीमारियाँ हो जाती है. । हर बात पर असतुन्ष्ठ  रहने पर , प्रभु की कृपा-दृष्टि से आंखे  मूँद कर दुखी रहने पर त्वचा संबधी रोग हो सकते हैं।  प्रभु ने जैसा घर,पति पत्नी, बच्चे ,सास ससुर,देवर जेठ , समधी  दादी, नानी, माता पिता और जो भी दिया है. , उस मे  हमें प्रसन्न रहने चाहिए। तभी जो हम स्वस्थ जीवन व्यतींत कर पायेंगे। 

शनिवार, 7 मई 2011

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

BE HAPPY............




Luminous environment brings hope..Every day is a celebration for us. Forget sorrows of life and be happy.

प्रकाशयुक्त वातावरण आशा लाता है .. हर दिन हमारे लिए एक उत्सव है. जीवन के दुखों को भूल जाओ और खुश रहो.

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

वेदना



दिनांक २.२.२०११

दोपहर खाने के बाद एक सहेली से बतियाते अचानक हम दोनों की आँखों से आंसू बहने लगे अपने -अपने पिता जी को स्मरण करके । कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि हम बेटिओं को पिता जीके साथ अल्पकाल के लिए ही रहना होता है। " मायके में जब हमजायेंगे तो पिता जी वहां नहीं होंगे " इस सत्य पर विश्वास करना असंभव होता है । हर बार मन कहता है कि पिताजी अभी हमारे बीच ही हैं, जरूर मिलेंगे हम उनसे । और यही आशा वेदना बन जाती है मायके जाकर ....,.